CEC Gyanesh Kumar विवाद: चुनाव आयोग के भीतर क्या चल रहा है?

By Bharat0KM | National Affairs | India

भारत में चुनाव की तारीख से कहीं पहले लोकतंत्र की एक अहम प्रक्रिया शुरू हो जाती है—मतदाता सूची तैयार करने की। किसका नाम सूची में रहेगा, किसका नाम जोड़ा जाएगा और किसका नाम हटेगा, इन फैसलों का सीधा संबंध नागरिक के मतदान के अधिकार से है। इसलिए जब देश के चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के भीतर ही कुछ फैसलों को लेकर सवाल उठने की खबर सामने आए, तो मामला महज राजनीतिक बयानबाजी नहीं रह जाता।
सितंबर 2026 में Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar को लेकर उठा विवाद इसी वजह से चर्चा में है।
मामला SIR यानी Special Intensive Revision (SIR) से शुरू होकर अब Election Commission की Internal Functioning, voter database, नए मतदाताओं के Registration और यहां तक कि CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया तक पहुंच चुका है।
•सबसे अहम बात यह है कि विवाद किसी बाहरी राजनीतिक दल के आरोप से ही नहीं उठा। Election Commission के दो मौजूदा Election Commissioners—Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi—द्वारा दर्ज की गई लिखित आपत्तियों ने इस बहस को नया आधार दिया है।

⭐ कहानी की शुरुआत कहां से हुई?
•SIR यानी Special Intensive Revision की शुरुआत बिहार में जून 2025 में हुई थी। इसका उद्देश्य electoral rolls का विशेष पुनरीक्षण और मतदाता सूची को अपडेट करना था। बाद में इसकी प्रक्रिया कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची।
•SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम draft rolls से हटाए जाने की खबरों ने राजनीतिक और कानूनी बहस को जन्म दिया। Election Commission का कहना रहा कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाने के लिए है, जबकि विपक्षी दलों ने नाम हटाए जाने और verification की प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
लेकिन सितंबर 2026 में विवाद का स्वरूप बदल गया।
🌟23 सितंबर को The Indian Express ने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि पिछले करीब 10 महीनों में Sandhu और Joshi ने कम-से-कम 14 बार लिखित रूप से कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के अनुसार ये आपत्तियां नए मतदाताओं के registration, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने, electoral-roll database की access और SIR से जुड़े दूसरे फैसलों तक फैली थीं।
•यहीं से यह सवाल राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया कि आखिर तीन सदस्यीय Election Commission के भीतर काम किस तरह हो रहा था।
⭐ 14 आपत्तियों में ऐसा क्या था?
•Indian Express की investigation के मुताबिक सबसे महत्वपूर्ण विवादों में से एक Form-6 से जुड़ा था।
•Form-6 वह आवेदन है जिसके जरिए कोई पात्र नागरिक नया मतदाता बनने के लिए आवेदन करता है। रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2026 में इसमें ऐसा सवाल जोड़ा गया जिसमें आवेदक से पूछा जा रहा था कि क्या वह, उसके माता-पिता या दादा-दादी पुराने SIR के Electoral Roll में मौजूद थे।
•रिपोर्ट के मुताबिक Election Commissioner Vivek Joshi ने पहले ही इस बदलाव को लेकर file पर आपत्ति जताई थी और Sukhbir Singh Sandhu ने भी उससे सहमति जताई थी। बाद में Sandhu ने इसे “unauthorised and illegal” बताते हुए हटाने की मांग की।
• यानी सवाल सिर्फ यह नहीं था कि Form-6 में नया सवाल क्यों आया। बड़ा सवाल यह था कि क्या इस तरह का बदलाव करने के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई थी?
⭐ दूसरा बड़ा सवाल—मतदाता database किसके नियंत्रण में?
•Election Commission की पारंपरिक व्यवस्था में electoral roll का काम काफी हद तक decentralised है। Electoral Registration Officer यानी ERO अपने क्षेत्र की मतदाता सूची का statutory authority होता है।
∆लेकिन Indian Express के अनुसार, दोनों Election Commissioners ने इस बात पर चिंता जताई कि electoral-roll database की access धीरे-धीरे centralise हो रही है और ground-level statutory authorities की पहुंच प्रभावित हो सकती है।
•Vivek Joshi ने मई 2026 में कथित तौर पर “gradual centralisation of the electoral roll database” पर सवाल उठाया और database access का audit कराने का सुझाव दिया।
•Sandhu ने भी अगस्त में state-level election officials की access को लेकर concerns दर्ज किए।
•यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि voter database में बदलाव केवल technical operation नहीं है। किसी व्यक्ति का नाम जुड़ना या हटना अंततः उसके मतदान के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
⭐ Cabinet Secretary तक क्यों पहुंची बात?
विवाद का सबसे असामान्य हिस्सा यही है।
•Indian Express की investigation के अनुसार, दोनों Election Commissioners ने electoral-roll के IT infrastructure और work allocation से जुड़े concerns Cabinet Secretary तक भी पहुंचाए।
∆रिपोर्ट के अनुसार उनका सवाल था कि IT system की निगरानी और access से जुड़े कुछ बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए थे और इससे oversight प्रभावित हो सकता था।
•इसके बाद 9 सितंबर 2026 को तीनों Commissioners की पूरी बैठक हुई, जो रिपोर्ट के अनुसार चार महीने बाद हुई थी।
•यही घटनाक्रम बताता है कि मामला केवल SIR की policy पर disagreement तक सीमित नहीं था; इसमें Commission के अंदर administrative functioning को लेकर भी सवाल उठ रहे थे।
⭐ Goa के 97 मतदाताओं का मामला
इस विवाद में Goa का एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण मामला भी सामने आया।
•Indian Express के मुताबिक Goa में 97 मतदाताओं को स्थानीय स्तर पर documents देखने के बाद eligible माना गया था, लेकिन software से जुड़ी समस्या के कारण उनकी स्थिति समय पर update नहीं हो सकी और वे final electoral roll में शामिल नहीं हो पाए।
•संख्या भले ही सिर्फ 97 हो, लेकिन मामला उस बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—अगर digital system में technical या administrative समस्या के कारण किसी पात्र नागरिक का नाम अंतिम मतदाता सूची में नहीं आता, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
⭐ तीन Election Commissioners आखिर काम कैसे करते हैं?
यहां एक बहुत जरूरी constitutional point समझना होगा।
•भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना करता है। यह आयोग को संसद, राज्य विधानसभाओं, तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की मतदाता सूची तैयार करने और संचालन का पूर्ण नियंत्रण व निर्देशन करने की शक्ति देता है।
•आज Commission में तीन सदस्य हैं:
1.Gyanesh Kumar — Chief Election Commissioner
2.Sukhbir Singh Sandhu — Election Commissioner
3.Vivek Joshi — Election Commissioner
•महत्वपूर्ण बात यह है कि CEC को तीनों में से ऐसा सदस्य नहीं माना जाता जो हर मामले में अकेले अंतिम फैसला कर सके।
🌟Chief Election Commissioner And Other Election Commissioners Act, 2023 की Section 18 के मुताबिक Commission का काम जहां तक संभव हो, सर्व-सम्मति से किया जाना चाहिए। अगर Commissioners की राय अलग हो जाए तो मामला बहुमत से तय किया जाता है।
•इसलिए दो Commissioners द्वारा लिखित objections दर्ज करना अपने आप में किसी फैसले को अवैध साबित नहीं करता। लेकिन यह जरूर बताता है कि Commission के भीतर किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर मतभेद दर्ज हुआ था।
और यही इस विवाद का institutional dimension है।
⭐ क्या Gyanesh Kumar ने अकेले फैसले लिए?
इस सवाल का जवाब सावधानी से समझना जरूरी है।
∆Indian Express की investigation में Sandhu और Joshi की objections सामने आई हैं। लेकिन Election Commission ने इन रिपोर्टों के जवाब में कहा कि अलग-अलग views और observations decision-making process का हिस्सा हैं और उसके final decisions unanimity से लिए गए हैं।
∆आयोग ने internal deliberations को final decisions से अलग बताते हुए अपने कामकाज का बचाव किया है।
∆इसलिए यह कहना कि “CEC ने अकेले सारे फैसले लिए” अभी स्थापित तथ्य के रूप में सही नहीं होगा।
•वास्तविक विवाद यह है कि अगर दो Commissioners ने बार-बार लिखित objections दिए, तो उन objections का institutional status क्या था और उनके बाद final decisions किस प्रक्रिया से लिए गए।
⭐ CEC को हटाने का process क्या है?
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या Gyanesh Kumar को सीधे हटाया जा सकता है-नहीं।
🌟संविधान का Article 324(5)
•भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324(5) भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, कार्यकाल और सेवा शर्तों की सुरक्षा से संबंधित है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज के समान होती है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है।
⭐भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को किसी विरोध-प्रदर्शन या जन-अभियान (Protest or Campaign) के माध्यम से उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है, क्योंकि उन्हें हटाने के लिए संविधान में एक निश्चित और जटिल कानूनी प्रक्रिया (महाभियोग जैसी प्रक्रिया) का प्रावधान है।”
🌟सामान्य रूप से प्रक्रिया इस तरह समझिए:
•पहला चरण: Parliament में removal motion का notice दिया जाता है।
•दूसरा चरण: पर्याप्त MPs के समर्थन के साथ notice संबंधित Presiding Officer के सामने जाता है।
•तीसरा चरण: अगर motion स्वीकार किया जाता है तो निर्धारित inquiry process शुरू हो सकता है।
•चौथा चरण: आरोपों की जांच होती है और alleged misbehaviour या incapacity से संबंधित findings सामने आती हैं।
•पांचवां चरण: दोनों Houses of Parliament में संवैधानिक रूप से आवश्यक special majority से motion पारित होना पड़ता है।
•छठा चरण: दोनों सदनों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद President removal order जारी करते हैं।
∆इसलिए “Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग” और “Gyanesh Kumar को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हटाना” एक ही चीज नहीं है।
⭐ क्या उन्हें हटाने की कोशिश पहले भी हुई थी?
हां।
•Gyanesh Kumar की नियुक्ति और Election Commission की नई appointment व्यवस्था पहले से राजनीतिक विवाद का विषय रही है। 2023 के कानून ने CEC और Election Commissioners की selection committee की संरचना बदली, जिसमें Chief Justice of India की जगह एक Union Cabinet Minister को शामिल किया गया।
•Gyanesh Kumar इस नई व्यवस्था के तहत CEC बनने वाले पहले व्यक्ति थे। उनकी नियुक्ति के समय Opposition की ओर से objections भी दर्ज हुए थे।
•2026 में उनके खिलाफ removal notices दिए जाने की खबरें भी सामने आईं। इसलिए सितंबर का विवाद किसी एक दिन से पैदा हुआ संकट नहीं है; इसके पीछे नियुक्ति, SIR और Election Commission की कार्यप्रणाली को लेकर कई महीनों से चल रही राजनीतिक और कानूनी बहस है।
⭐ फिर 23 सितंबर इतना महत्वपूर्ण क्यों बन गया?
•क्योंकि उस दिन सामने आई investigation ने पहली बार इतनी स्पष्टता से यह बताया कि Commission के भीतर ही दो Commissioners ने महीनों तक लिखित रूप में concerns दर्ज किए थे और ये concerns मामूली administrative matters तक सीमित नहीं थे।
⭐वे सीधे जुड़े थे—
👉 नए मतदाताओं के registration से
👉 voter deletion और restoration से
👉 electoral-roll database की access से
👉 SIR की प्रक्रिया से
👉 software और IT oversight से
👉 और Commission की internal decision-making से।
इसके बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हुईं। Opposition नेताओं ने CEC के इस्तीफे और कार्रवाई की मांग की, जबकि BJP और Election Commission की ओर से इन आरोपों को अलग नजरिए से पेश किया गया।
⭐ अब CJP का 48 घंटे का ultimatum
•विवाद के बीच Cockroach Janta Party (CJP) ने Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग करते हुए 48 घंटे का ultimatum दिया है।
•CJP ने कहा है कि यदि CEC इस्तीफा नहीं देते हैं तो 2 अक्टूबर, Gandhi Jayanti से nationwide protest शुरू किया जाएगा। रिपोर्टों के अनुसार अभियान Mumbai से शुरू करने की बात कही गई है।
•यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह CJP की राजनीतिक मांग और घोषित protest programme है। इससे CEC का संवैधानिक removal अपने आप नहीं होता।
⭐ क्या मामला Supreme Court तक भी पहुंच गया?
हां।
•26 सितंबर 2026 को Supreme Court में एक petition दाखिल होने की खबर सामने आई है, जिसमें Election Commission के भीतर सामने आए alleged unilateral decisions और internal concerns की जांच के लिए कार्रवाई की मांग की गई है। Petition में Indian Express की 23 सितंबर की investigation में प्रकाशित documentary records का भी हवाला दिया गया है।
•इससे विवाद अब केवल राजनीतिक मंचों और मीडिया की बहस तक सीमित नहीं रहा; इसका एक हिस्सा न्यायिक scrutiny के दायरे में भी पहुंच गया है।
⭐ विवाद के बीच ECI का जवाब: तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से हुए SIR के आदेश
•CEC Gyanesh Kumar को लेकर चल रहे विवाद के बीच 26 सितंबर 2026 को Election Commission of India ने अपने आधिकारिक X handle के जरिए अपना पक्ष सामने रखा। आयोग ने उन रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया दी, जिनमें Election Commission के भीतर मतभेद और SIR से जुड़े फैसलों पर दो Election Commissioners की आपत्तियों का जिक्र किया गया था।
•ECI ने स्पष्ट किया कि SIR से जुड़े आदेश किसी एक Election Commissioner के स्तर पर जारी नहीं किए गए, बल्कि Commission के तीनों सदस्यों की मंजूरी के बाद ही जारी हुए। आयोग के मुताबिक उसकी बैठकों में अलग-अलग मुद्दों पर सवाल उठना, स्पष्टीकरण मांगा जाना या सुझाव दिया जाना decision-making process का हिस्सा है। इसे अपने आप Commission के भीतर “मतभेद” या “टकराव” का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
•आयोग ने यह भी कहा कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यानी ECI के आधिकारिक पक्ष के अनुसार, SIR से जुड़े फैसलों को लेकर तीनों Election Commissioners के बीच कोई ऐसा institutional split नहीं है जैसा हालिया रिपोर्टों से समझा जा रहा है।
•इसी बैठक में SIR की प्रक्रिया को लेकर कुछ अहम फैसले भी लिए गए। आयोग ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों को SIR के तहत notice जारी किया गया है, उन्हें सामान्य परिस्थितियों में personal hearing के लिए खुद उपस्थित होना जरूरी नहीं होगा। जरूरत पड़ने पर वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना जवाब और दस्तावेज जमा कर सकते हैं, जबकि exceptional मामलों में व्यक्तिगत सुनवाई कराई जा सकती है।
•आयोग ने कुछ राज्यों में SIR से जुड़ी समय-सीमाओं में भी बदलाव किया है। इसके अलावा ECINet platform की expert review कराने का फैसला भी लिया गया है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हालिया विवाद में electoral-roll database, software और access control को लेकर भी सवाल उठे थे।
∆हालांकि, ECI के इस स्पष्टीकरण के बावजूद विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। एक तरफ आयोग कह रहा है कि अंतिम फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी और सर्वसम्मति से हुए, वहीं दूसरी तरफ सामने आई documents-based reports में दो Election Commissioners की ओर से अलग-अलग समय पर दर्ज की गई लिखित आपत्तियों का उल्लेख है।
∆इसलिए अब इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—क्या ये लिखित आपत्तियां केवल internal deliberation का हिस्सा थीं, या उन्होंने Commission की decision-making process में वास्तविक असहमति को दर्शाया?
•इसका जवाब आगे सामने आने वाले official records, judicial proceedings और उपलब्ध दस्तावेजों से ही अधिक स्पष्ट होगा।⭐ लोकतंत्र के लिए असली चिंता क्या है?
इस सवाल का जवाब किसी एक राजनीतिक दल के बयान में नहीं छिपा है।
•Election Commission लोकतांत्रिक व्यवस्था की उस कड़ी का नाम है जिस पर चुनाव की निष्पक्षता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता का बड़ा हिस्सा निर्भर करता है।
∆अगर voter database की access, नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया, software controls या Commission के अंदर decision-making को लेकर सवाल उठते हैं, तो सबसे जरूरी चीज है—पारदर्शिता
•लेकिन दूसरी तरफ, किसी Commissioner की objection या किसी political party के आरोप को अपने आप चुनावी गड़बड़ी का अंतिम प्रमाण मान लेना भी सही नहीं होगा।
•इसलिए इस पूरे विवाद में दो बातें साथ-साथ समझनी जरूरी हैं।
•पहली—14 लिखित objections का सामने आना एक गंभीर institutional development है और इसके बारे में स्पष्ट जवाब मांगा जाना स्वाभाविक है।
•दूसरी—इन objections का होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि चुनाव में धांधली हुई या कोई अपराध हुआ। इसके लिए दस्तावेजों, कानूनी प्रक्रिया, official records और जहां आवश्यक हो वहां न्यायिक जांच के निष्कर्षों को देखना होगा।
•और शायद यही इस विवाद का सबसे बड़ा सवाल है—
अगर चुनाव कराने वाली संस्था के भीतर ही उसके दो सदस्य किसी प्रक्रिया पर बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज कर रहे हों, तो क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि उन आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई और अंतिम फैसला किस आधार पर लिया गया?
•सितंबर 2026 का Gyanesh Kumar विवाद इसी सवाल को देश के सामने खड़ा कर रहा है।
∆यह केवल एक CEC या एक राजनीतिक दल की कहानी नहीं है। यह उस संस्था की transparency और institutional accountability की कहानी है जिसके हाथ में भारत की चुनावी प्रक्रिया की जिम्मेदारी है।

Bharat0KM पर पढ़िए पूरी कहानी—क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ वोट डालने का अधिकार ही महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि उस वोट तक पहुंचने वाली पूरी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा भी उतना ही जरूरी है।

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