जंतर-मंतर 2026: भारत की Gen Z का उदय ।

हर पीढ़ी के जीवन में एक ऐसा निर्णायक क्षण आता है—एक ऐसा समय, जब सामान्य युवा यह तय करते हैं कि अब चुप रहना कोई विकल्प नहीं है। भारत की Gen Z के लिए 2026 की गर्मियों का समय ऐसा ही एक क्षण बन गया।6 जून 2026 को हजारों छात्र नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्र हुए। यहीं से एक ऐसा आंदोलन शुरू हुआ, जो आगे चलकर हाल के भारतीय इतिहास के सबसे बड़े युवा-नेतृत्व वाले नागरिक आंदोलनों में से एक बन गया। तत्काल कारण था परीक्षा में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और एक निष्पक्ष, पारदर्शी तथा जवाबदेह परीक्षा प्रणाली सुनिश्चित करने में विफलता को लेकर छात्रों में व्यापक आक्रोश।लाखों अभ्यर्थियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल परीक्षाएँ नहीं होतीं। इनके पीछे वर्षों की मेहनत, परिवार का त्याग, आर्थिक संघर्ष और बेहतर भविष्य के सपने जुड़े होते हैं। जब इन परीक्षाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए, तो छात्रों को लगा कि उनके भविष्य को ही खतरे में डाल दिया गया है। यह विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में और अभिजीत दिपके के नेतृत्व में शुरू हुआ। इसकी शुरुआत एक शांतिपूर्ण धरने के रूप में हुई, जिसमें कथित परीक्षा अनियमितताओं की स्वतंत्र जाँच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार, अधिक पारदर्शिता, सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही और युवाओं के लिए बेहतर अवसरों की माँग की गई।बहुत जल्द यह आंदोलन केवल परीक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहा। यह निष्पक्षता, पारदर्शिता और सार्वजनिक संस्थानों पर भरोसे की व्यापक माँग में बदल गया।अभिजीत दिपके आंदोलन के प्रमुख आयोजक और सार्वजनिक चेहरा बनकर उभरे। CJP के माध्यम से उन्होंने स्वयंसेवकों के समन्वय, अनिश्चितकालीन धरने के आयोजन, विभिन्न राज्यों के छात्रों को mobilize करने, प्रतिदिन मीडिया को संबोधित करने और सरकारी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लगातार प्रदर्शनकारियों से अनुशासन बनाए रखने और अहिंसक तरीकों का पालन करने की अपील की।

CJP ने स्वयं को पारंपरिक चुनावी राजनीति से अलग, सार्वजनिक मुद्दों पर केंद्रित एक युवा-नेतृत्व वाले मंच के रूप में प्रस्तुत किया। इससे शिक्षा, रोजगार और शासन व्यवस्था को लेकर चिंतित विभिन्न पृष्ठभूमियों के छात्र इस आंदोलन से जुड़ सके।

छात्रों की चार प्रमुख माँगें-

जवाबदेही: परीक्षा में अनियमितताओं और पेपर लीक से जुड़े विवादों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।

-न्याय और मुआवजा: परीक्षा से जुड़े घटनाक्रम के बीच जान गंवाने वाले छात्र अभ्यर्थियों के परिवारों को ₹1 करोड़ का मुआवजा।-

सोनम वांगचुक की रिहाई: आंदोलन के चरम दौर में हिरासत में लिए गए कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की तत्काल रिहाई।

FIR वापस लेना: प्रदर्शनकारी छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी पुलिस FIR और कानूनी मामलों को पूरी तरह वापस लेना।

आंदोलन में सोनम वांगचुक की एंट्री28 जून 2026 को प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक आंदोलन में शामिल हुए। यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि वांगचुक ने आंदोलन की शुरुआत या आयोजन नहीं किया था। उनके शामिल होने से कई सप्ताह पहले ही छात्र नेतृत्व में आंदोलन शुरू हो चुका था।वांगचुक प्रदर्शनकारियों के समर्थन में जंतर-मंतर पहुँचे और उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वे न्याय, निष्पक्षता और पारदर्शिता की माँग कर रहे छात्रों के समर्थन में खड़े हैं।उनकी भागीदारी ने आंदोलन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व ध्यान दिलाया। मीडिया कवरेज में काफी वृद्धि हुई, नागरिक समाज के कई संगठनों ने समर्थन जताया और बड़ी संख्या में लोगों को छात्रों की माँगों के बारे में जानकारी मिली।बाद में जब उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, तब भी वांगचुक शांतिपूर्ण संवाद और लोकतांत्रिक समाधान की वकालत करते रहे। वे आंदोलन की एक प्रभावशाली नैतिक आवाज बन गए।दिल्ली से पूरे देश तक पहुँचा आंदोलनदिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह छात्र आंदोलन, जो CJP के नेतृत्व और सोनम वांगचुक के समर्थन के साथ NEET 2026 तथा शिक्षा व्यवस्था को लेकर चल रहा था, जल्द ही राजधानी की सीमाओं से बाहर निकल गया।पटना, बिहार, मुंबई और देश के अन्य शहरों में भी विरोध प्रदर्शन और समर्थन में कार्यक्रम आयोजित हुए। इस तरह दिल्ली का छात्र आंदोलन धीरे-धीरे देशव्यापी Gen-Z आंदोलन में बदल गया।जो आंदोलन शुरुआत में परीक्षा की निष्पक्षता की माँग से शुरू हुआ था, वह आगे चलकर पारदर्शिता, जवाबदेही और भारत के छात्रों के भविष्य की सामूहिक आवाज बन गया।संसद की ओर शांतिपूर्ण मार्च और पुलिस कार्रवाईजैसे-जैसे आंदोलन में भागीदारी बढ़ती गई, हजारों छात्रों ने अपनी माँगों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए संसद की ओर शांतिपूर्ण मार्च करने का प्रयास किया।दिल्ली पुलिस ने बैरिकेड लगाकर मार्च को रोक दिया और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कार्रवाई की। इसके बाद झड़पें हुईं।लाठीचार्ज, हिरासत में लिए जाने और प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग के वीडियो सोशल मीडिया तथा समाचार मंचों पर तेजी से फैल गए। इससे देशभर में व्यापक बहस छिड़ गई।ऑनलाइन प्रसारित कुछ वीडियो में पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग होता हुआ दिखाई दिया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि कील लगे डंडों और पेलेट गन का इस्तेमाल किया गया, जबकि अधिकारियों ने इन आरोपों की पुष्टि नहीं की या इनसे असहमति जताई।स्वतंत्र पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया की भूमिकाइस आंदोलन का एक और महत्वपूर्ण पहलू स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल न्यूज़ क्रिएटर्स की भूमिका रही।

आंदोलन के बढ़ने के साथ कई छात्रों और समर्थकों को लगा कि मुख्यधारा के मीडिया के कुछ हिस्सों में आंदोलन की व्यापकता के अनुरूप पर्याप्त कवरेज नहीं दी जा रही थी। हालाँकि कुछ मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों ने विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग की, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारों ने अक्सर जंतर-मंतर से लगातार और ज़मीनी स्तर की रिपोर्टिंग की तथा छात्रों की आवाज को सीधे जनता तक पहुँचाया।NewsPinch के अभिनव पांडे, Jist News की मेधा यादव, सार्थक गोस्वामी, काव्या कर्नाटक, हर्ष यादव, सोनल पाटेरिया, अजीत अंजुम, संदीप भाटिया और कई अन्य पत्रकार व डिजिटल क्रिएटर्स आंदोलन की जमीनी जानकारी के महत्वपूर्ण स्रोत बन गए।उनके कैमरे वहीं मौजूद थे जहाँ घटनाएँ हो रही थीं—वे छात्रों से बात कर रहे थे, आंदोलन का माहौल दिखा रहे थे, घटनाक्रम का पीछा कर रहे थे, पुलिस कार्रवाई को रिकॉर्ड कर रहे थे और दर्शकों को प्रदर्शन स्थल की वास्तविक स्थिति से सीधे परिचित करा रहे थे।उदाहरण के लिए, NewsPinch ने जंतर-मंतर आंदोलन की व्यापक कवरेज की, जिसमें लाइव और प्रदर्शन के बाद की रिपोर्टें भी शामिल थीं।स्वतंत्र डिजिटल कवरेज इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह आंदोलन मुख्य रूप से Gen-Z और सोशल मीडिया से संचालित था। स्वतंत्र और वैकल्पिक पत्रकार पारंपरिक टेलीविजन न्यूज़ की संरचना से बाहर निकलकर सीधे युवा दर्शकों तक पहुँचने में सक्षम थे।आंदोलन पर हुई चर्चाओं में यह भी सामने आया कि कई प्रदर्शनकारी सार्थक भाटिया जैसे स्वतंत्र और वैकल्पिक पत्रकारों को प्राथमिकता दे रहे थे। यह युवा दर्शकों के बीच पारंपरिक टेलीविजन पत्रकारिता के कुछ हिस्सों के प्रति बढ़ते अविश्वास को दर्शाता था।सूचना और नैरेटिव की लड़ाईप्रदर्शन स्थल के बाहर आंदोलन के नैरेटिव को प्रभावित करने के प्रयासों को लेकर भी आरोप और चर्चाएँ सामने आईं।

कुछ लोगों ने दावा किया कि राजनीतिक हित आंदोलन में छात्रों की भागीदारी को हतोत्साहित करने वाले अभियानों या गतिविधियों का समर्थन कर रहे थे।हालाँकि, ऐसे दावों को तब तक केवल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, जब तक स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण उपलब्ध न हों।लेकिन एक बात स्पष्ट थी—आंदोलन को लेकर एक तीव्र सूचना-युद्ध चल रहा था।एक तरफ छात्र अपनी आवाज देश तक पहुँचाने की कोशिश कर रहे थे, तो दूसरी तरफ अलग-अलग नैरेटिव यह तय करने की कोशिश कर रहे थे कि देश आंदोलन को किस नजरिए से देखे।ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकार केवल रिपोर्टर नहीं रह गए। वे जंतर-मंतर और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक पुल बन गए।उनकी रिपोर्टिंग के माध्यम से देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठे लोग छात्रों की आवाज सीधे सुन सके, प्रदर्शन स्थल का माहौल देख सके और केवल टेलीविजन की सुर्खियों पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं अपनी राय बना सके।

इस आंदोलन ने आधुनिक लोकतंत्र के बारे में एक महत्वपूर्ण बात सामने रखी—जब पारंपरिक मीडिया जनता की सूचना की माँग को पूरी तरह संतुष्ट नहीं करता, तो नागरिक तेजी से स्वतंत्र पत्रकारिता, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सीधे जमीनी रिपोर्टिंग की ओर रुख करते हैं।इन पत्रकारों ने सिर्फ भारत को यह नहीं बताया कि प्रदर्शन हो रहा है—उन्होंने भारत को दिखाया कि जमीन पर वास्तव में क्या हो रहा है।लोकतांत्रिक अधिकारों पर बहसकई समर्थकों का कहना था कि पुलिस की कार्रवाई शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन थी।भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार देता है।समर्थकों का तर्क था कि इन लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे छात्रों की आवाज सुनी जानी चाहिए थी, न कि उन्हें बलपूर्वक हटाया जाना चाहिए था।दूसरी ओर, सरकार का कहना था कि इन अधिकारों पर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए संविधान के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं और उच्च-सुरक्षा वाले क्षेत्रों में व्यवधान रोकने के लिए पुलिस कार्रवाई की गई।फिर भी यह घटना आंदोलन के सबसे अधिक बहस वाले मुद्दों में से एक बन गई और इससे प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रति जनता की सहानुभूति और बढ़ी।

फिल्म जगत का समर्थनआंदोलन को भारतीय फिल्म उद्योग की कई प्रमुख हस्तियों का भी समर्थन मिला।शबाना आज़मी, प्रकाश राज, स्वरा भास्कर, दीया मिर्जा जैसे कलाकारों तथा सार्वजनिक हस्तियों ने प्रदर्शनकारियों के प्रति सार्वजनिक रूप से समर्थन व्यक्त किया। इनमें से कुछ जंतर-मंतर भी पहुँचे और छात्रों के साथ खड़े हुए।उनके समर्थन ने आंदोलन को छात्र समुदाय से आगे ले जाने और जंतर-मंतर पर उठाए जा रहे मुद्दों को व्यापक जनता तक पहुँचाने में मदद की।घर बैठे लोगों की एकजुटताइस आंदोलन की सबसे खूबसूरत बातों में से एक यह थी कि जंतर-मंतर पर मौजूद न होने वाले लोगों ने भी आंदोलन का समर्थन किया।देशभर से अनगिनत लोगों ने अपने घरों से छात्रों और स्वयंसेवकों के लिए Swiggy, Zomato और Instamart जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से भोजन, पानी और अन्य जरूरी सामान पहुँचाया।वे शायद भीड़ में खड़े होकर प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने तरीके से इस संघर्ष के साथ खड़े होने का रास्ता खोज लिया।यह छोटा-सा प्रयास भारतीय समाज में मौजूद एक गहरी भावना—एकजुटता, सहानुभूति और सामूहिक जिम्मेदारी—को दर्शाता था।इसने दिखाया कि जब लोग अपने साथी नागरिकों को किसी ऐसी चीज के लिए संघर्ष करते देखते हैं जिसे वे सही मानते हैं, तो दूरी हमेशा समर्थन में बाधा नहीं बनती।कभी-कभी मीलों दूर से भेजा गया एक भोजन भी यह कह सकता है—“आप अकेले नहीं खड़े हैं।”

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाआंदोलन को भारत के बाहर भी ध्यान मिला।इसका पैमाना, सोनम वांगचुक की भागीदारी, छात्रों की माँगें और प्रदर्शनकारियों तथा प्रशासन के बीच टकराव ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी कवरेज और चर्चा को जन्म दिया।इससे यह स्पष्ट हुआ कि जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह युवा आंदोलन अब केवल प्रदर्शन स्थल तक सीमित नहीं रहा था।जंतर-मंतर से आगे बढ़ा आंदोलनछात्रों और अभिभावकों से लेकर स्वतंत्र पत्रकारों, फिल्मी हस्तियों, नागरिक समाज के समर्थकों और अपने घरों से आंदोलन में भाग लेने वाले लोगों तक—इस आंदोलन ने धीरे-धीरे एक व्यापक एकजुटता का नेटवर्क बना लिया।जंतर-मंतर अब केवल एक प्रदर्शन स्थल नहीं रहा था।वह शिक्षा, जवाबदेही, लोकतांत्रिक अधिकारों और भारत के युवाओं के भविष्य को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन चुका था।यह आंदोलन केवल उन लोगों का नहीं था जो शारीरिक रूप से जंतर-मंतर पहुँच सकते थे।हजारों लोग, जो विभिन्न कारणों से प्रदर्शन स्थल तक नहीं पहुँच सके, अपने घरों से आंदोलन का हिस्सा बने। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से छात्रों की आवाज को बढ़ाया, प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन और जरूरी सामान की व्यवस्था में सहयोग किया और ऑनलाइन अभियानों में भाग लिया।न्यायपालिका तक पहुँची लड़ाईयह संघर्ष कानूनी मैदान तक भी पहुँचा।जिन लोगों को लगा कि छात्रों के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, उन्होंने न्यायपालिका का रुख किया। सर्वोच्च न्यायालय और अन्य न्यायिक मंचों के समक्ष ऑनलाइन याचिकाओं तथा PIL से जुड़े कानूनी प्रयास किए गए।इन प्रयासों का उद्देश्य न्यायिक हस्तक्षेप, जवाबदेही और छात्रों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।उनके लिए अदालत एक और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक रास्ता बन गई—जो सड़कों और सोशल मीडिया जितना ही महत्वपूर्ण था।इस तरह यह आंदोलन जंतर-मंतर पर एकत्रित भीड़ से कहीं बड़ा बन गया।कुछ छात्र सड़कों पर खड़े थे।

कुछ लोग अपने घरों से उनका समर्थन कर रहे थे।कुछ सोशल मीडिया पर आवाज उठा रहे थे।और कुछ लोग संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से न्याय की तलाश कर रहे थे। हर किसी ने अपनी भूमिका निभाई।और शायद यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत थी।जो लोग प्रदर्शनकारियों के साथ शारीरिक रूप से खड़े नहीं हो सकते थे, उन्होंने भी उन्हें अकेला खड़ा नहीं रहने दिया।यह एकजुटता, सहानुभूति, सामूहिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास की एक शक्तिशाली भावना को दर्शाता था।यह विश्वास कि जब किसी एक समूह के अधिकारों को खतरा होता है, तो पूरे समाज की जिम्मेदारी बनती है कि वह आवाज उठाए।सरकार का रुख और सुधारों की चर्चाशुरुआत में सरकार ने परीक्षा प्रणाली का बचाव किया और प्रदर्शनकारियों की प्रमुख माँगों को खारिज किया, जिनमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग भी शामिल थी।जैसे-जैसे आंदोलन देशभर में फैलता गया और जनता का दबाव बढ़ा, जंतर-मंतर और संसद के आसपास सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत की गई।इसी बीच प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच बातचीत भी धीरे-धीरे शुरू हुई।इन वार्ताओं के साथ-साथ सरकार ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता मजबूत करने के उद्देश्य से कुछ प्रस्ताव भी सामने रखे। इनमें पेपर लीक के खिलाफ कड़े कदम तथा परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए सुधार शामिल थे।क्या भारत वास्तव में लोकतंत्र है?प्रदर्शन के चरम दौर में सोशल मीडिया, विश्वविद्यालय परिसरों और सार्वजनिक चर्चाओं में एक सवाल बार-बार गूंजने लगा—“क्या भारत वास्तव में एक लोकतंत्र के रूप में काम कर रहा है?

”कई छात्रों को लगा कि वे शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और अपनी बात रखने के संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग ने लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।समर्थकों का कहना था कि पुलिस कार्रवाई अनुच्छेद 19(1)(a) की भावना के खिलाफ थी, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, और अनुच्छेद 19(1)(b) के भी विरुद्ध थी, जो बिना हथियार शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार देता है।वहीं, प्रशासन का कहना था कि सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने के लिए संविधान उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है।मौलिक अधिकारों और राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच यही तनाव पूरे आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बहसों में से एक बन गया।इसने भारत के अनेक युवाओं को लोकतंत्र, असहमति और संवैधानिक अधिकारों के वास्तविक अर्थ पर विचार करने के लिए मजबूर किया।भारत की Gen Z का निर्णायक आंदोलनजो आंदोलन परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन के रूप में शुरू हुआ था, वह अंततः भारत की Gen Z के एक निर्णायक आंदोलन में बदल गया।इसने दिखाया कि जब युवाओं को लगता है कि उनका भविष्य दाँव पर लगा है, तो वे शांतिपूर्ण तरीके से संगठित होने, संस्थाओं पर सवाल उठाने और लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी करने के लिए तैयार हैं।इस आंदोलन ने परीक्षा सुधार, युवाओं के रोजगार, संस्थागत जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों की सुरक्षा को लेकर देशव्यापी बहस को जन्म दिया।

आंदोलन का परिणामआंदोलन का अंत एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के साथ हुआ।केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई 2026 को ट्विटर के माध्यम से अपने इस्तीफे की पुष्टि की।कई सप्ताह तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में एकजुट होकर खड़े रहे लाखों छात्रों के लिए इसे एक महत्वपूर्ण जीत के रूप में देखा गया।यह इस बात की शक्तिशाली याद दिलाने वाला क्षण था कि लोकतंत्र में दृढ़ और एकजुट नागरिक सामूहिक कार्रवाई के माध्यम से सार्वजनिक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।लेकिन जंतर-मंतर का आंदोलन केवल एक शिक्षा मंत्री को हटाने का अभियान नहीं था।किसी मंत्री का इस्तीफा अपने आप में भविष्य के पेपर लीक को रोक नहीं सकता और न ही एक खराब परीक्षा प्रणाली को ठीक कर सकता है।इस्तीफा केवल आंदोलन की एक माँग थी।बड़ा सवाल जवाबदेही का था।छात्र सत्ता में बैठे लोगों को यह संदेश दे रहे थे—अगर कोई सरकार गलती करती है, संस्थाएँ विफल होती हैं या प्रशासनिक असफलताओं की कीमत युवाओं को चुकानी पड़ती है, तो किसी न किसी को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।और जब जवाबदेही नहीं होती, तो नागरिकों को लोकतांत्रिक अधिकार है कि वे सवाल पूछें, विरोध करें और जवाब माँगें।इस अर्थ में यह आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान से कहीं बड़ा था।यह एक सिद्धांत स्थापित करने के बारे में था—कोई भी सरकार जनता की निगरानी से ऊपर नहीं है और कोई भी संस्था जवाबदेही से परे नहीं होनी चाहिए।छात्र किसी एहसान की माँग नहीं कर रहे थे।वे सत्ता से सवाल पूछने के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे थे।

शायद जंतर-मंतर का सबसे शक्तिशाली संदेश यह नहीं था—“मंत्री को हटाओ।”बल्कि यह था—“जनता की आवाज सुनो।”क्योंकि लोकतंत्र केवल सरकार चुनने का नाम नहीं है।लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि नागरिकों को सरकार से सवाल पूछने, उसके फैसलों को चुनौती देने और उसके विफल होने पर जवाबदेही माँगने की स्वतंत्रता हो।इस्तीफा परिणाम हो सकता है।लेकिन जवाबदेही असली माँग थी।और छात्रों की आवाज उस सोच का जवाब थी कि नागरिकों को बस चुपचाप सब कुछ सहते रहना चाहिए।जय हिंद 🇮🇳जय भारत 🇮🇳🫡

@post credit – Bajarangi

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