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26 दिन, हजारों अभ्यर्थी और एक ‘ईमानदार मौके’ की लड़ाई: धरने से भूख हड़ताल, विधानसभा मार्च से अदालत तक पहुंचा JPSC-JSSC विवाद—जानिए झारखंड के युवा आंदोलन की पूरी कहानी”

26 दिनों का संघर्ष: झारखंड के युवा अभ्यर्थियों ने जब भर्ती व्यवस्था से मांगा ‘ईमानदार मौका’रांची के धरने से लेकर विधानसभा मार्च, भूख हड़ताल और अदालत की चौखट तक—JPSC-JSSC विवाद ने सिर्फ परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर नहीं, बल्कि पूरी भर्ती व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए।भारत0KM | राष्ट्रीय मामले | भारतसरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे किसी युवा के लिए एक भर्ती परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं होती।उसके पीछे वर्षों की मेहनत होती है। हजारों घंटे की पढ़ाई होती है। परिवार की आर्थिक कुर्बानियां होती हैं। कई बार निजी जीवन और दूसरी संभावनाओं को छोड़कर सिर्फ एक लक्ष्य के पीछे दौड़ना होता है।और इन सबसे ऊपर होती है—एक सुरक्षित भविष्य की उम्मीद।इसीलिए जब किसी भर्ती परीक्षा की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठता है, तो उसका असर सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। वह हजारों युवाओं के भविष्य, परिवारों की उम्मीद और पूरी व्यवस्था पर भरोसे को प्रभावित करता है।जुलाई और अगस्त 2026 में रांची में यही हुआ।26 दिनों तक चले इस आंदोलन में धरना था, भूख हड़ताल थी, सरकार से बातचीत थी, विधानसभा की ओर मार्च था, पुलिस कार्रवाई थी और अंततः कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने तथा अन्य प्रक्रियाओं की जांच के सरकारी फैसले थे।लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार के फैसले से जहां आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों को राहत मिली, वहीं पहले से चयनित हजारों उम्मीदवारों के सामने अपने भविष्य को बचाने की चुनौती खड़ी हो गई।यानी एक ही भर्ती विवाद में दो अलग-अलग समूह सामने आ गए—एक कह रहा था—“हमें निष्पक्ष परीक्षा चाहिए।”और दूसरा पूछ रहा था—“अगर हमने ईमानदारी से परीक्षा पास की है, तो हमारी नौकरी क्यों जाए?”यही विरोधाभास झारखंड के इस आंदोलन को महज एक छात्र आंदोलन से कहीं बड़ा बना देता है।

⭐आंदोलन की शुरुआत: 25 जुलाई से उठी आवाजरांची में आंदोलन की औपचारिक शुरुआत 25 जुलाई 2026 को हुई।छात्रों और सरकारी नौकरी के अभ्यर्थियों ने झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाई।विवाद के केंद्र में विशेष रूप से 14वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षा, JSSC-CGL और कुछ अन्य भर्ती प्रक्रियाएं थीं।लेकिन असंतोष की जड़ें इससे कहीं पुरानी थीं।झारखंड में भर्ती परीक्षाएं लंबे समय से पेपर लीक, प्रक्रियागत अनियमितताओं, परीक्षा में देरी, मूल्यांकन विवाद और कानूनी चुनौतियों जैसे आरोपों और विवादों का सामना करती रही हैं।ऐसे में नई शिकायतें पुराने जख्मों को फिर से खोल रही थीं।अभ्यर्थियों के सामने मूल सवाल यही था—«अगर किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर ही भरोसा नहीं रहा, तो युवा वर्षों तक उसकी तैयारी किस विश्वास के साथ करें?»29 जुलाई तक आंदोलन ने संगठित रूप ले लिया।छात्रों ने रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया।अब यह आंदोलन किसी एक परीक्षा की शिकायत नहीं रह गया था।यह भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठता एक व्यापक सवाल बन चुका था

⭐क्या चाहते थे प्रदर्शनकारी?आंदोलन की मांगें स्पष्ट थीं:प्रदर्शनकारी चाहते थे कि—•JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की CBI जांच कराई जाए।•जिन परीक्षाओं में गड़बड़ी की आशंका है, उन्हें रद्द किया जाए।•भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए।• अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो।•भर्ती आयोगों की कार्यप्रणाली में सुधार किया जाए।•ईमानदार और योग्य अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा की जाए।इनमें CBI जांच की मांग सबसे अहम मुद्दों में से एक बन गई।प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि भर्ती विवादों की पिछली जांचों से पर्याप्त जवाबदेही सामने नहीं आई।उनका सवाल सीधा था—अगर व्यवस्था साफ है तो स्वतंत्र जांच से डर कैसा? और अगर गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदार लोगों को बचाया क्यों जाए?अभ्यर्थियों के लिए समस्या सिर्फ परीक्षा रद्द करने या बचाने की नहीं थी।वे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें उन्हें यह भरोसा हो कि उनकी मेहनत का मूल्यांकन ईमानदारी से होगा|धरना से भूख हड़ताल तक पहुंचा आंदोलनसरकार की ओर से बातचीत के प्रयास हुए, लेकिन आंदोलन थमा नहीं।छात्र स्टेडियम में डटे रहे।इसके बाद आंदोलन ने और तीखा रूप लिया—भूख हड़ताल।छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए और उन्होंने लंबी भूख हड़ताल की।उनका अनशन 16 दिनों तक चला।धरना स्थल धीरे-धीरे सिर्फ विरोध का स्थान नहीं रहा।वह उन हजारों युवाओं की साझा बेचैनी का प्रतीक बन गया, जो अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, लेकिन एक ही समस्या से जूझ रहे थे—भर्ती व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहे?सरकार से बातचीत हुई, लेकिन गतिरोध बरकरार रहाझारखंड सरकार ने प्रदर्शनकारियों से कई दौर की बातचीत की।अधिकारी और मंत्री छात्र प्रतिनिधियों से मिले।लेकिन बातचीत बार-बार दो प्रमुख मुद्दों पर अटक गई—CBI जांच और JSSC-CGL परीक्षा का रद्द होना।सरकार का कहना था कि प्रदर्शनकारियों की कई मांगों पर पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है।छात्र प्रतिनिधियों का जवाब था कि जब तक उनकी मुख्य मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक बाकी कदम पर्याप्त नहीं हैं।यही गतिरोध आंदोलन को लंबा खींचता गया।

⭐10 अगस्त: जब आंदोलन सड़कों पर उतराआंदोलन का सबसे तनावपूर्ण दौर 10 अगस्त को आया।हजारों छात्र और नौकरी के अभ्यर्थी झारखंड विधानसभा की ओर मार्च करने लगे।उद्देश्य स्पष्ट था—सरकार पर दबाव बढ़ाना।विधानसभा की ओर बढ़ते प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच बैरिकेडिंग के पास टकराव की स्थिति बनी।कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा बैरिकेड पार करने या तोड़ने की कोशिश के बाद पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वॉटर कैनन, आंसू गैस और लाठी का इस्तेमाल किया।पुलिस का पक्ष था कि कुछ प्रदर्शनकारियों के आक्रामक होने के बाद सीमित बल का इस्तेमाल किया गया।दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन पर लोकतांत्रिक विरोध को दबाने का आरोप लगाया।यह घटना आंदोलन के लिए निर्णायक मोड़ थी।रांची का यह धरना अब सिर्फ एक छात्र आंदोलन नहीं दिख रहा था।यह राज्य प्रशासन और युवा नौकरी अभ्यर्थियों के बीच एक बड़ा सार्वजनिक टकराव बन चुका था।

⭐जंतर-मंतर से अलग थी रांची की कहानीझारखंड का आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर छात्र आंदोलन के बाद सामने आया था।दोनों आंदोलनों के केंद्र में कुछ समान चिंताएं थीं—पेपर लीक, परीक्षा में अनियमितता, बेरोजगारी और योग्यता के साथ अन्याय का डर।लेकिन दोनों की प्रकृति अलग थी।दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रित था और उसकी पहुंच राज्य की सीमाओं से काफी आगे थी।वहीं रांची का आंदोलन मुख्य रूप से JPSC-JSSC और झारखंड की भर्ती व्यवस्था से जुड़े सवालों पर केंद्रित रहा।यहां स्थानीय छात्र संगठन, अभ्यर्थी और स्थानीय नेता आंदोलन की रीढ़ थे।अभिजीत दिपके की भूमिका भी इसी संदर्भ में समझना जरूरी है।यह कहना सही नहीं होगा कि दिपके का झारखंड आंदोलन से कोई संपर्क नहीं था।2 अगस्त को उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों से बातचीत की है और CJP उनकी मांगों के साथ खड़ा है। बाद की रिपोर्टों में रांची में उनकी मौजूदगी या समर्थन का भी उल्लेख किया गया।लेकिन दिल्ली के जंतर-मंतर आंदोलन की तरह वह झारखंड आंदोलन के केंद्रीय आयोजक या मुख्य चेहरा नहीं थे।एक वायरल वीडियो को लेकर भी भ्रम पैदा हुआ, जिसमें दावा किया गया कि रांची में दिपके का स्वागत किया जा रहा है।बाद में फैक्ट-चेक में सामने आया कि वीडियो वास्तव में CJP के जंतर-मंतर प्रदर्शन का था।यह अंतर महत्वपूर्ण है।क्योंकि रांची की कहानी मूलतः स्थानीय अभ्यर्थियों और छात्र संगठनों के संघर्ष की कहानी थी।इतना बड़ा आंदोलन, फिर भी राष्ट्रीय सुर्खियों से दूर क्यों?यह सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।हजारों छात्र।26 दिनों का धरना।भूख हड़ताल।विधानसभा मार्च।पुलिस कार्रवाई।सरकार से लगातार बातचीत।फिर भी राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक विमर्श में झारखंड आंदोलन को दिल्ली के आंदोलन जैसी जगह नहीं मिली।क्यों?•एक वजह स्पष्ट है—राजधानी का राजनीतिक और मीडिया प्रभाव।दिल्ली में होने वाला कोई बड़ा आंदोलन तुरंत राष्ट्रीय राजनीतिक तंत्र, राष्ट्रीय मीडिया और केंद्रीय संस्थानों की नजर में आ जाता है।रांची के आंदोलन के साथ ऐसा स्वाभाविक रूप से नहीं होता।•दूसरी वजह थी मुद्दे की जटिलता।यह सिर्फ एक परीक्षा का विवाद नहीं था।इसमें JPSC, JSSC, अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाएं, पुराने आरोप, जांच और कानूनी विवाद—सब एक साथ जुड़े हुए थे।लेकिन शायद सबसे बड़ा कारण इससे भी सरल है—«देश की राष्ट्रीय सुर्खियों से बाहर रहने वाले युवाओं की समस्याएं अक्सर राष्ट्रीय चर्चा से भी बाहर रह जाती हैं।»

⭐सरकार का बड़ा फैसलाकई हफ्तों के गतिरोध के बाद अगस्त के मध्य में स्थिति बदलनी शुरू हुई।•सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा और TSR Data Processing Pvt. Ltd. (TDPL) के माध्यम से आयोजित अन्य भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला किया।•TDPL एक आउटसोर्स एजेंसी थी, जो कथित अनियमितताओं को लेकर जांच के दायरे में थी।•सरकार ने 2014 से भर्ती प्रक्रियाओं में सामने आई कथित अनियमितताओं की व्यापक समीक्षा और जांच की दिशा में भी कदम उठाया।इसके बाद कार्रवाई का दायरा और बढ़ा।•रिपोर्टों के अनुसार, 22 भर्ती परीक्षाएं रद्द की गईं और 23 अन्य परीक्षाओं या प्रक्रियाओं की जांच के आदेश दिए गए।•वहीं सरकार की एक अन्य सूची में व्यापक समूह के रूप में 44 भर्ती परीक्षाओं और प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया।इन आंकड़ों में अंतर इस बात से जुड़ा था कि अलग-अलग सरकारी सूचियों में प्रभावित परीक्षाओं और प्रक्रियाओं को किस तरह वर्गीकृत किया गया।सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार, भर्ती आयोगों में आंतरिक सतर्कता तंत्र और व्यापक संस्थागत सुधारों के लिए समिति जैसे कदमों की भी घोषणा की।प्रदर्शनकारियों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी।उनकी सबसे महत्वपूर्ण मांगों में से एक—परीक्षाओं पर कार्रवाई—आखिरकार पूरी होती दिखाई दी।

⭐19 अगस्त: 26 दिन बाद आंदोलन स्थगित•लगातार 26 दिनों के संघर्ष के बाद 19 अगस्त 2026 को आंदोलन स्थगित कर दिया गया।•लेकिन इसे पूरी जीत या समस्या का अंतिम समाधान कहना सही नहीं होगा।•प्रदर्शनकारियों ने सरकार को बाकी मांगों पर कार्रवाई और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए 60 दिनों का समय दिया।भूख हड़ताल समाप्त हुई।धरना स्थल धीरे-धीरे खाली होने लगा।लेकिन छात्रों के लिए यह अंत नहीं था।यह सिर्फ एक विराम था।क्योंकि इसी फैसले ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया।

⭐एक फैसला, दो पक्ष—और दोनों के अपने सवालसरकार ने कथित अनियमितताओं के कारण परीक्षाएं रद्द कीं।*लेकिन इन परीक्षाओं को पास कर चुके कुछ उम्मीदवार पहले ही नियुक्त हो चुके थे।उनके लिए परीक्षा रद्द होना किसी जीत का हिस्सा नहीं था।यह उनके भविष्य पर मंडराता संकट था।📖रिपोर्टों के अनुसार लगभग 3,000 उम्मीदवारों को अपनी सरकारी नौकरी खोने का डर था।📖एक अन्य रिपोर्ट में लगभग 2,628 कर्मचारियों या उम्मीदवारों की नियुक्तियां प्रभावित होने की बात कही गई।इन उम्मीदवारों का तर्क था कि अगर गड़बड़ी कुछ व्यक्तियों या किसी एजेंसी ने की है, तो उसकी सजा उन लोगों को क्यों मिले जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा पास की?उनका सवाल बेहद सरल था—∆“अगर हमने ईमानदारी से परीक्षा पास की है, तो किसी और की कथित बेईमानी की सजा हमें क्यों मिले?”यहीं से भर्ती विवाद का दूसरा अध्याय शुरू हुआ।

⭐सड़क से अदालत तक पहुंची लड़ाईइसके बाद विवाद अदालत पहुंच गया।*11वीं से 13वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षाओं के सफल अभ्यर्थियों ने परीक्षाओं और नियुक्तियों को रद्द करने के सरकारी फैसले को चुनौती दी।

✍️झारखंड हाईकोर्ट ने बाद में सरकार के फैसले पर रोक लगाई, जिससे अदालत पहुंचे 342 सफल अभ्यर्थियों को राहत मिली।👉इसके बाद हाईकोर्ट ने JSSC-CGL और CDPO परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले पर भी रोक लगा दी।अब स्थिति पहले से कहीं अधिक जटिल थी।सरकार का तर्क था कि भर्ती व्यवस्था में विश्वास बहाल करने के लिए कार्रवाई जरूरी है।उम्मीदवारों का तर्क था कि कथित अनियमितता करने वालों की पहचान और कार्रवाई की जाए, लेकिन निर्दोष सफल उम्मीदवारों को सामूहिक रूप से दंडित न किया जाए।यानी सवाल अब सिर्फ यह नहीं था कि—🧾“परीक्षा में गड़बड़ी हुई या नहीं?”बल्कि यह भी था—*अगर गड़बड़ी हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है और उसकी कीमत कौन चुकाए?तो आखिर जीता कौन?शायद इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है।प्रदर्शनकारियों ने क्या हासिल किया?उन्होंने सरकार को भर्ती परीक्षाओं से जुड़े आरोपों पर कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया।•परीक्षाएं रद्द हुईं। •जांच के आदेश दिए गए।•भर्ती व्यवस्था में सुधार की चर्चा सामने आई।और सबसे महत्वपूर्ण:•भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता का सवाल राज्य की बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक बहस बन गया।लेकिन यह जीत अधूरी भी थी।CBI जांच की मांग पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।अदालत के हस्तक्षेप ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि केवल परीक्षा रद्द कर देना अपने आप में न्याय का अंतिम समाधान नहीं हो सकता।और इसी बीच हजारों चयनित उम्मीदवार अपनी नौकरियां बचाने के लिए संघर्ष करने लगे।

⭐असली सवाल: व्यवस्था की गलती की कीमत कौन चुकाए?झारखंड की पूरी कहानी को अगर एक वाक्य में समेट दिया जाए—“छात्रों ने प्रदर्शन किया, सरकार ने परीक्षाएं रद्द कीं और आंदोलन खत्म हो गया”तो यह पूरी तस्वीर नहीं होगी।असल कहानी दो पक्षों के बीच फंसे उस सवाल की है, जिसका जवाब आसान नहीं है।👉एक तरफ छात्र कहते हैं—•“हम वर्षों तक ऐसी परीक्षाओं की तैयारी नहीं कर सकते, जिनकी निष्पक्षता पर ही भरोसा न हो।”

👉दूसरी तरफ सफल उम्मीदवार कहते हैं—•“जिस अनियमितता में हमारी कोई भूमिका नहीं थी, उसकी वजह से हमारा करियर क्यों खत्म हो?”और इन दोनों के बीच राज्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी खड़ी होती है—•दोषियों की पहचान करना।•दोषियों को सजा देना।•निर्दोष उम्मीदवारों की रक्षा करना।• भर्ती व्यवस्था में युवाओं का भरोसा वापस लाना।यही असली परीक्षा है।क्योंकि परीक्षा रद्द करना आसान हो सकता है।लेकिन एक ऐसी परीक्षा आयोजित करना, जिस पर हर अभ्यर्थी आंख बंद करके भरोसा कर सके—कहीं ज्यादा कठिन है।•जांच जरूरी है।•जवाबदेही जरूरी है।•लेकिन निर्दोष उम्मीदवारों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।और एक पूरी पीढ़ी के युवाओं का भरोसा दोबारा हासिल करना—शायद सबसे बड़ी चुनौती है।

⭐26 दिन, एक स्टेडियम और एक ‘ईमानदार मौके’ की मांग26 दिनों तक रांची का एक स्टेडियम हजारों युवा अभ्यर्थियों के लिए सिर्फ धरना स्थल नहीं था।वह उनका कक्षा-कक्ष भी था, इंतजार की जगह भी और संघर्ष का मैदान भी।वे वहां इसलिए नहीं बैठे थे कि प्रदर्शन करना पढ़ाई से आसान था।वे इसलिए वहां थे क्योंकि उनके लिए वर्षों की मेहनत का मूल्य इसी सवाल से जुड़ा था—क्या जिस परीक्षा के जरिए उनका भविष्य तय होगा, वह परीक्षा खुद निष्पक्ष है?रांची का आंदोलन सरकार को इस सवाल का सामना करने के लिए मजबूर करने में सफल रहा।लेकिन इसकी अंतिम कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।इसका अगला अध्याय सरकारी दफ्तरों में लिखा जाएगा।जांच की फाइलों में लिखा जाएगा।और अदालतों के फैसलों में लिखा जाएगा।झारखंड की इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश सिर्फ JPSC या JSSC तक सीमित नहीं है।यह राज्य और उसके युवाओं के बीच भरोसे का सवाल है।जब कोई युवा सरकारी नौकरी के लिए वर्षों तक तैयारी करता है, तो वह सरकार से कोई एहसान नहीं मांगता।वह सिर्फ एक चीज चाहता है—

✍️एक ईमानदार मौका।और जब उस ईमानदार मौके की बुनियाद ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो खामोशी पर्याप्त नहीं रह जाती।झारखंड के 26 दिनों का यह आंदोलन, अपनी मूल भावना में, उसी ईमानदार मौके की लड़ाई था।

@post credit – Bajarangi

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